देवतालाब मंदिर

मध्यप्रदेश के रीवा में स्थित देवतालाब मंदिर का इतिहास अत्यंत रहस्यमय हैं, बताया जाता है की इस दिव्य मंदिर का निर्माण एक दिन में हुआ है.

ऑपइंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार रीवा का देवतालाब मंदिर निर्माण में ऋषि मर्कण्डु की संतान महर्षि मार्कण्डेय का योगदान रहा है, महर्षि मार्कण्डेय जन्म से ही शिव भक्त थे. मंदिर निर्माण के इतिहास से जुड़े रहस्यों पर गौर करें तो पोरौणिक कथाओं के मुताबिक महर्षि मार्कण्डेय इस पवित्र स्थान पर देवों के देव महादेव की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया था, जिसके परिणाम स्वरूप एक रात में ही मंदिर निर्माण हुआ है.

बताया जा रहा है की महर्षि मार्कण्डेय भारतवर्ष में सनातन और शिव भक्ति के प्रचार-प्रसार के लिए अक्सर भ्रमण किया करते थे. उनकी ऐसी ही एक यात्रा के मध्य उनका आगमन विंध्य के रेवा क्षेत्र में हुआ जो की वर्तमान में रीवा के नाम से पसिद्ध है. रीवा में देवतालाब नामक स्थान पर जब महर्षि ने विश्राम के लिए अपना डेरा जमाया तब अनायास ही उनके मन में भगवान शिव के दर्शन की अभिलाषा जाग उठी.

मार्कण्डेय जी शिव के अनन्य भक्त थे, उन्होंने अपने अराध्य प्रभु से कह दिया की चाहे जिस रूप में दर्शन मिलें किन्तु दर्शन मिलने तक वे यहीं तप करते रहेंगे. इसलिए वे कई दिनों तक भगवान शिव की तपस्या करते रहे उनके तप की तीव्रता को देखकर भगवान शिव ने विश्वकर्मा जी को आदेश दिया कि वो उस स्थान पर एक शिव मंदिर का निर्माण करें, भगवान विश्वकर्मा जी ने एक विशालकाय पत्थर से रातों रात ही उस स्थान पर एक दिव्य शिव मंदिर का निर्माण कर दिया.

परन्तु तपस्या में मग्न मार्कण्डेय को इस घटना का कोई आभास भी नहीं सके. मंदिर कार्य पूर्णतः सम्पन्न होने के पश्चात ही भगवान शिव की मानस प्रेरणा से महर्षि ने अपना तप समाप्त किया, शिव मंदिर देखकर महर्षि अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने वहाँ स्थित कुंड में स्नान कर भगवान शिव की आराधना की और बस तभी से यह मंदिर पूरे विंध्य प्रदेश में पूज्य है.

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