बद्रीनाथ मंदिर

भगवान विष्णु को समर्पित बद्रीनाथ मंदिर हिंदुओं के सबसे पवित्र स्थल चार धामों में से एक हैं, इस स्थान का अस्तित्व सतयुग के समय का है.

सृष्टि के पालन हारा श्री हरी को समर्पित यह बद्रीनाथ मंदिर सनातन धर्म में विश्वास रखने वालों के लिए अत्यंत ही विशेष हैं. यह मंदिर जहां स्थापित है, उसके आसपास के क्षेत्र को इसी के नाम से यानि बद्रीनाथ ही कहा जाता है. सतयुग से जुड़ा यह स्थान उत्तराखंड में अलकनंदा नदी के तट पर स्थापित हैं और इस मंदिर को बद्रीनारायण के नाम से जाना जाता है. इस तीर्थ स्थल का वर्णन हिंदुओं के कई ग्रन्थों में भी पाया जाता है.

कई पौरोणिक ग्रन्थों के अनुसार प्राचीन काल में वर्तमान बद्रीनाथ धाम का क्षेत्र शिव भूमि (केदारखण्ड) के रूप में अवस्थित था. जब गंगा नदी धरती पर अवतरित हुई तो यह बारह धाराओं में बँट गई तथा इस स्थान पर से होकर बहने वाली धारा अलकनन्दा के नाम से विख्यात हुई. एक बार भगवान विष्णु जब अपने ध्यानयोग हेतु उचित स्थान खोज रहे थे, तब उन्हें अलकनन्दा के समीप यह स्थान बहुत भाया. नीलकण्ठ पर्वत के समीप भगवान विष्णु ने बाल रूप में अवतार लिया और रुदन करने लगे. उनका रूदन सुन कर माता पार्वती का हृदय द्रवित हो उठा और उन्होंने बालक के समीप उपस्थित होकर उसे मनाने का प्रयास किया और बालक ने उनसे ध्यानयोग करने हेतु वह स्थान मांग लिया. यही पवित्र स्थान वर्तमान में बद्रीविशाल के नाम से सर्वविदित है.

इसके अलावा विष्णु पुराण में भी इस स्थान से जुड़ी एक कथा प्रचलित हैं, बताया जाता है की धर्म के दो पुत्र थे ‘नर’ और ‘नारायण’. दोनों ने धर्म के विस्तार हेतु वर्षों तक इसी स्थान पर तपस्या करी थी. जब वे दोनों अपने आश्रम स्थापित करने के लिए एक आदर्श स्थान की खोज कर रहे थे तब अलकनंदा नदी के पीछे उन्हें एक गर्म और एक ठंडा पानी का चश्मा मिला, जिसके पास के क्षेत्र को उन्होंने बद्री विशाल नाम दिया.

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