भारत की आजादी के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले भगतसिंह को उनके दो साथियों के साथ आज ही दिन वर्ष 1933 में फांसी दी गई थी, इसके बाद से देश में क्रांति की लेकर ओर तेज हो गई.

भगतसिंह

शहीद भगत सिंह, शहीद सुखदेव थापर और शहीद शिवराम हरी राजगुरु आज ही के यानि 23 मार्च को फांसी पर देश की स्वतंत्रता के लिए हंसते हंसते झूल गए. इन तीनों को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अधिकारी जे. पी. सांडर्स की हत्या का दोषी करार देते हुए इन्हें धारा 302 के तहत ही मृत्यु की सजा सुनाई गई थी.

भगतसिंह के विचार युवाओं के लिए प्रेरणादायक

देश के लिए शहीद होने वाले वीर भगत सिंह एक युवा क्रान्तिकारी थे, उन्होंने महज 19 वर्ष की अल्प आयु में तत्कालीन अंग्रेजों के संसद भवन में बम फेंक कर अपनी आवाज को देश तक पहुंचाया और फिर पूरा भारत भी भगत के साथ साथ पूर्ण स्वराज की मांग करने लगा. तब महात्मा गांधी को भी भगत सिंह की इस राष्ट्रवादी विचार का समर्थन किया था. उनके जाने के इतने समय बाद भी उनके झुझारू और संकल्पित विचार आज भी देश भर के युवाओं को प्रेरित करते हैं.

23 मार्च 1933 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को जे. पी. सांडर्स की हत्या करने का अपराधी मानते हुए अंग्रेजी हुकुमत ने इन्हें फांसी दी थी. तीनों क्रांतिकारियों के इस सर्वोच्च बलिदान के बाद पुरे देश में आजादी की लहर गरमा गई. बता दें की इंकलाब जिंदाबाद का नारा भी पहली बार देश को भगत सिंह ने ही दिया था.

बलिदान दिवस पर विशलेषण

आजाद भारत में वैसे तो बहुत से दिन ऐसे हैं जब विभिन्न क्षेत्रों में बलिदान दिवस मनाया जाता है, जिनमें से मुख्यतः 30 जनवरी (महात्मा गांधी की हत्या), 23 मार्च (भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी).

इनके अलावा 21 अक्टूबर के दिन वर्ष 1959 में केन्द्रीय पुलिस बल के जवान लद्दाख में चीनी सेना के एक एंबुश में शहीद हुए थे, इस कारण 21 अक्टूबर को पुलिस की ओर से बलिदान दिवस मनाया जाता है. 17 नवंबर को लाला लाजपत राय की स्मृति में ओडिशा में बलिदान दिवस मनाया जाता है. 19 नवंबर को रानी लक्ष्मीबाई के जन्मदिन के दिन बलिदान दिवस मनाया जाता है.

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