महामहिम भीष्म

महाभारत के सबसे अहम पात्रों में से एक देवव्रत सत्यवती को दी अपनी एक भीषण प्रतिज्ञा के कारण महामहिम भीष्म के नाम से भी पहचाने जाने लगे.

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा रचित महाकाव्य ग्रन्थ महाभारत में महामहिम भीष्म एक प्रमुख पात्र हैं. जन्म के बाद से उनका नाम देवव्रत था, वे हस्तिनापुर के महाराज शांतनु तथा माता गंगा के पुत्र थे. उन्होंने माता गंगा की पवित्रता की शप्त लेते हुए शांतनु की प्रेमिका सत्यवती का सामने यह प्रतिज्ञा की थी की वे कभी भी हस्तिनापुर राजा नहीं बनेंगे और सदा ही इस महान राज्य के दास बने रहेंगें, इस दौरान उन्होंने आजीवन ब्रह्मचारी रहना का प्रण किया था जिससे उनका परिवार न बने ताकि सत्यवती के पुत्रों को राज सिंघासन मिलने में कोई बाधा ना हो. ऐसी भीष्म प्रतिज्ञा के कारण ही उनका नाम देवव्रत से ‘भीष्म’ पड़ गया.

कुरु सम्राट महाराज शांतनु का विवाह गंगा से हुए और उनके 7 पुत्रों को माता गंगा ने पानी में डुबोकर मार दिया, किन्तु उनके आठवें और अंतिम पुत्र को महाराज शांतनु ने मरने नहीं दिया. उसी पुत्र का नाम था देवव्रत, देवव्रत ने भगवान परशुराम से विद्या का दान प्राप्त किया. अपनी प्रतिज्ञा को निभाते – निभाते उन्होंने माता सत्यवती और महाराज शांतनु के पुत्र को ही राजा बनाया, जिसके बाद उन्होंने उनके पुत्र धृतराष्ट्र को राजा बनाया और अपनी प्रतिज्ञा अनुसार हस्तिनापुर के सेवक बनकर जीवन व्यतीत करने लगे.

गौरतलब है की उनकी भीष्म प्रतिज्ञा के महाराज शांतनु खुद को उनका अपराधी मानने लगे थे, पिता को इस अपराध से मुक्त करने के लिए देवव्रत ने उनसे इच्छा मृत्यु का वरदान मांगा और कहा की वे तब तक अपनी मृत्यु की कामना नहीं करेंगें जब तब हस्तिनापुर में धर्मराज कायम ना हो जाए. अपने इतने लंबे जीवन काल में उन्होंने कई पापों का बोझ भी झेला. महाभारत युद्ध में भी उन्होंने किसी भी कुरु पुत्र के नहीं मरने का वचन निभाया, लेकिन युद्ध के दसवें दिन भगवान श्री कृष्ण की योजना अनुसार अर्जुन अपने रथ पर शिखंडी को ले आया और एक अन्य वचन के कारण महामहिम भीष्म ने अपने शस्त्रों का त्याग कर दिया. जिसके बाद अर्जुन ने अपने तीष्ण बाणों से देवव्रत के शरीर को भेद डाला और उन्हें तीरों की शय्या पर लेटा दिया. युद्ध समाप्ति के बाद युधिष्ठिर हस्तिनापुर के राजा बने तो राज्य धर्म को स्थापित देख भीष्म ने अपनी मृत्यु की इच्छा की.

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