इन्द्रप्रस्थ

महाभारत काल में हस्तिनापुर को छोड़ कर पांडवों ने इन्द्रप्रस्थ नामक नवीन नगर की स्थापना की थी, जिस नगर को आज दिल्ली के नाम से जाना जाता है.

महाभारत हमारे देश भारत के इतिहास का स्वर्णिम इतिहास भी माना जाता है और पांडवों की ओर से महाभारत के महायुद्ध को आरंभ करने का कारण उनका राज्य इन्द्रप्रस्थ माना जाता है. 12 वर्ष वनवास और 1 वर्ष के अज्ञातवास के बाद जब पांडवों ने अपना राज्य वापस मांगा तो दुर्योधन ने मना कर दिया, जिस कारण विवश होकर पांडवों को युद्ध का आवाहन देने पड़ा. बता दें की इन्द्रप्रस्थ को पांडवों ने ही अपने कठिन परिश्रम और तपस्या से बसाया था.

वर्तमान में आप और हम इन्द्रप्रस्थ को दिल्ली के नाम से जानते हैं, दिल्ली भारत की राजधानी भी है. जब सम्राट धृतराष्ट्र के आदेश पर हस्तिनापुर का विभाजन कर दिया गया तो पांडवों को खांडववन सहित हस्तिनापुर गणराज्य की आधी भूमि पर अधिकार सौंपा गया. परन्तु पांडवों के लिए इतना सहज नहीं था की खांडववन में जाकर नय नगर की स्थापना करे, क्योंकि उस समय खांडववन या खांडवप्रस्थ के वन में नागराज तक्षक का कब्जा था और वो वहां अपनी पूरी फौज के साथ वास करता था.

पांडवों को तक्षक का सामना करना पड़ा और फिर अर्जुन ने एक ही बाण से पुरे जहरीले वन को नष्ट कर दिया, जिसके बाद देव राज इंद्र के आशीर्वाद से उस नगर को बसाया और इसी कारण इसका नाम देवराज इंद्र के नाम पर इन्द्रप्रस्थ रखा गया. बता दें की श्री कृष्ण के आदेश पर ही भगवान विश्वकर्मा ने अद्भुत राजमहल और नगरी का निर्माण किया था. समय के साथ – साथ इस नगर में भी परिवर्तन होता गया और इसे दिल्ली के नाम से पहचाना जाने लगा. महाभारत के युद्ध के पश्चात ये राज्य हस्तिनापुर के ही अधीन रहा और युधिष्ठिर ही हस्तिनापुर के राजा बने रहे.

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