शिवमंदिर

हिंदू शास्त्रों के अनुसार खंडित मूर्ति अथवा शस्त्र की पूजा करना मना है, परन्तु क्या आप जानते हैं? की एक ऐसा शिव मंदिर है जिसमें खंडित त्रिशूल की पूजा होती है.

धार्मिक शास्त्रों के अनुसार हिंदू देवी देवताओं की खंडित होई हुई मूर्ति की पूजा नहीं करनी चाहिए. लेकिन भोले शिव की भक्ति करने के लिए नियमों की आवश्यकता नहीं होती, ऐसा ही उदाहरण जम्मू से 120 किलोमीटर की दुरी पर पटनीटॉप के नजदीक ही स्थित विश्व प्रसिद्ध सुध महादेव मंदिर में देखने को मिलता है.

शिवमंदिर

शिवमंदिर में खंडित त्रिशूल की पूजा

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार देश के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक, सुध महादेव मंदिर में खंडित त्रिशूल की पूजा की जाती है. लोगों का मानना है की यह मंदिर लगभग 2800 साल पुराना मंदिर है. यह मंदिर भगवान शिव के सर्वाधित लोकप्रिय मंदिरों की श्रेणी में भी आता है.

बता दें की इस मंदिर में एक विशाल त्रिशूल हैं जिसके 3 टुकड़े धरती के अंदर गढ़े हुए हैं और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ये स्वंय भगवान शिव के त्रिशूल के टुकड़े हैं. त्रिशूल के अलावा इस मंदिर में एक प्राचीन शिवलिंग, नंदी और शिव परिवार के सभी सदस्यों की मूर्तियां हैं. इस मंदिर के कुछ दुरी पर माता पार्वती की जन्मस्थली मानतलाई भी है.

शिवमंदिर के निर्माण की रहस्यमय कथा

इस शिवमंदिर के निर्माण की कथा बहुत अनोखी ओर रहस्यमय हैं, पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार माता पार्वती जी मंदिर में शिव जी की पूजा करने आयीं और उनके पीछे पीछे सुधान्त नाम का राक्षस भी आ गया, वह भी शिव भक्त था और पूजा करने आया था. माता पार्वती ने जब अपनी आंखें खोलीं और राक्षस को देखा तो वह चीख पड़ीं.

उनकी चीख सुनकर भगवान शिव को लगा की वे किसी संकट में है, तो महादेव ने अपने त्रिशूल के प्रहार से दानव का वध कर दिया. बाद में महादेव को अपनी भूल का स्मरण हुआ और उन्होंने सुधान्त से कहा कि उसके नाम पर ही मंदिर का नाम सुध महादेव मंदिर के नाम से जाना जाएगा.

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