मत्स्य अवतार

सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु के प्रमुख दशावतार में से प्रथम अवतार मत्स्य अवतार को ही माना जाता है, इनसे जुड़ी कथा भी अत्यधित रहस्मय हैं.

हिंदू यानि की सनातन धर्म से जुड़े पौरोणिक ग्रन्थों में लिखा गया है की चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के दिवस भगवान श्री हरी विष्णु ने इस धरती पर अपना प्रथम अवतार लिया था. वे आधे मनुष्य और आधे मछली यानि की मत्स्य के रूप में धरती पर अवतरित हुए थे, इसी कारण उनके इस रूप मत्स्य अवतार के नाम से जाने जाना लगा. उन्होंने यह अवतार वेदों की रक्षा और हैग्रीव नामक दत्य का अंत करने के लिए लिया था तथा इस संसार को प्रलय से भी बचाया था.

विक्की पीडिया की जानकारियों के मुताबिक मत्स्य अवतार में भगवान विष्णु सर्वप्रथम राजा सत्यव्रत मनु सामने प्रकट किया. सुबह सत्यव्रत सूर्यदेव को अर्घ्य दे रहे थे तभी एक मछली नें उनसे कहा कि आप मुझे अपने कमंडल में रख लो. दया और धर्म के अनुसार इस राजा ने मछली को अपने कमंडल में ले लिया और घर की ओर निकले, घर पहुँचते तक वह मत्स्य उस कमंडल के आकार का हो गया, राजा नें इसे एक पात्र पर रखा परंतु कुछ समय बाद वह मत्स्य उस पात्र के आकार की हो गई. अंत में राजा नें उसे समुद्र में डाला तो उसने पूरे समुद्र को ढँक लिया.

जिसके बाद राजा सब समझ गया. भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार ने राजा से कहा की उस दिवस के ठीक सातवें दिन प्रलय आएगा तत्पश्चात् विश्व का नया श्रृजन होगा वे सत्यव्रत को सभी जड़ी-भूति, बीज और पशुओं, सप्त ऋषि आदि को इकट्ठा करके प्रभु द्वारा भेजे गए नाव में संचित कर लेवें. जिसके बाद इस विशाल मछली ने दानव हैग्रीव का वध किया और वेदों की भी रक्षा करी. फिर जब धरती पर प्रलय आया एक विशाल नाव में संसार के प्राणियों को समाकर यही विशाल मछली यानि की भगवान मत्स्य जी ने बचाया.

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