मुरुदेश्वर मंदिर

रामायण काल से स्थापित मुरुदेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित हैं, परिसर में विराजित शिव प्रतिमा 123 फीट और 249 ऊंचा गोपुरम कुतुबमीनार से भी ऊंचा.

भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर का इतिहास रामायण से जुड़ा हुआ है. मंदिर के आकर्षण का मुख्य केंद्र हैं परिसर का गोपुरम, जो की कुतुबमीनार से भी ऊंचा हैं. कुतुबमीनार की ऊंचाई लगभग 237 फीट हैं और मुरुदेश्वर मंदिर के गोपुरम की ऊंचाई 249 फीट हैं. इसके अलावा मंदिर परिसर में महादेव शिव की एक विशाल प्रतिमा स्थापित हैं, जिसकी ऊंचाई लगभग 123 फीट हैं. मुरुदेश्वर मंदिर अरब हिंद महासागर की गोद में विराजमान है, क्योंकि मंदिर को तीन दिशाओं से समुद्र ने घेर रखा है.

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ऑपइंडिया की रिपोर्ट के अनुसार मुरुदेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास रामायण काल से जुड़ा हुआ है. बताया जाता है की शिव पुराण में भगवान शिव के आत्मलिंग के बारे में बताया गया है. रावण ने अमरता का वरदान प्राप्त करने और महा-शक्तिशाली बनने के लिए भगवान शिव को अपनी तपस्या से प्रसन्न किया और उनसे आत्मलिंग प्राप्त किया. इसके बाद जब रावण ने उस आत्मलिंग को लंका ले जाने का प्रयास किया, महादेव ने रावण से कहा की इसे जब भी जमीन पर रखोगे तो ये वहीं स्थापित हो जाएगा, फिर इसे कोई उठा भी नहीं पाएगा.

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दैवीय कारणों से हुआ भी ऐसा ही, भगवान शिव को मुरुदेश्वर के नाम से भी जाना जाता है. इसलिए यह मंदिर जहां स्थित है, उस कस्बे का नाम मुरुदेश्वर और मंदिर का नाम मुरुदेश्वर मंदिर पड़ गया. मंदिर की स्थित की बात करें तो यह भारत के कर्नाटक राज्य में उत्तर कन्नड़ जिले के भटकल तहसील की कंडुका पहाड़ी पर स्थित हैं. इस मंदिर में आपको आध्यात्मिक दिव्यता के साथ प्राकृतिक सौन्दर्य भी देखने को मिलता है.

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विक्की पीडिया की जानकारियों के मुताबिक मुरुदेश्वर मंदिर के बाहर बनी शिव भगवान की मूर्ति विश्व की दूसरी सबसे ऊँची शिव मूर्ति है और इसकी ऊँचाई 123 फीट है. अरब सागर में बहुत दूर से इसे देखा जा सकता है. इसे बनाने में दो साल लगे थे और शिवमोग्गा के काशीनाथ और अन्य मूर्तिकारों ने इसे बनाया था. इसका निर्माण उसी स्थानीय श्री आर एन शेट्टी ने करवाया और लगभग 5 करोड़ भारतीय रुपयों की लागत आई थी. मूर्ति को इस तरह बनवाया गया है कि सूरज की किरणे इस पर पड़ती रहें और यह चमकती रहे.

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