मुरुगन मंदिर

डिंडीगुल के पलनि के शिवगिरि पर्वत पर स्थित अरुल्मिगु दंडायुधपाणी मंदिर अथवा मुरुगन मंदिर भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय को समर्पित हैं.

न्यूज़ कप (newscup.in) की धर्म-मंदिर श्रंखला में हम प्रति दिन नित्य एक धर्म संस्कृति अथवा मंदिर वास्तुकला से जुड़े प्रसारण प्रकाशित करते हैं, इसी क्रम को जारी रखते हुए आज आप भगवान शिव के जेष्ठ (बड़ा) पुत्र के सबसे प्रसिद्ध मंदिर के बारे में. भगवान कार्तिकेय को समर्पित मुरुगन मंदिर तमिलनाडू के डिंडीगुल के पलनि के शिवगिरि पर्वत पर स्थित हैं. इस एतिहासिक और दुर्लभ मंदिर का वर्णन स्थल पुराण और तमिल साहित्य में भी मिलता है, परन्तु वर्तमान मंदिर का निर्माण चेर वंशज राजा चेरामन पेरुमल ने करवाया था.

ऑपइंडिया की रिपोर्ट की माने तो स्थल पुराण में इस मंदिर के विषय में वर्णित है की जब महर्षि नारद ने भगवान शिव और माता पार्वती को ‘ज्ञानफलम’ अर्थात ज्ञान का फल उपहार स्वरूप दिया तो भगवान शिव ने उसे अपने दोनों पुत्रों भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय स्वामी में से किसी एक को देने का निर्णय लिया. इस फल की प्राप्ति के लिए महादेव ने दोनों पुत्रों के समक्ष एक लक्ष्य रखा की जो भी संसार की परिक्रमा शीघ्रता से सम्पन्न करेगा, उसे ही यह फल प्राप्त होगा.

पिता के आदेशानुसार भगवान कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर सवार होकर परिक्रमा के लिए प्रस्थान कर गए, किन्तु भगवान गणेश ने अपनी सुझबुझ से अपने पिता शंकर और माता पार्वती की परिक्रमा पूरी कर कहा की मेरे लिए मेरे माता पिता ही सम्पूर्ण संसार है. यह सुनकर भगवान शिव प्रसन्न हुए और वह फल उन्हें दे दिया. जब भगवान कार्तिकेय परिक्रमा सम्पन्न कर वापस लौटे तो उन्हें इस घटना जानकारी मिली, जिससे वे रुष्ठ होकर कैलाश छोड़ पलनि के शिवगिरि पर्वत पर निवास करने चले गए. कुछ मान्यताओं के अनुसार आज भी यहां ब्रह्मचारी मुरुगन स्वामी बाल रूप में विराजमान हैं.

बता दें की इस मंदिर में सबसे रहस्यमय तो मंदिर की दिव्य मूर्ति है, भगवान मुरुगन स्वामी की मूर्ति 9 बेहद जहरीले पदार्थों को मिलाकर बनाई गई है. आयुर्वेद में इन जहरीले पदार्थों को एक निश्चित अनुपात में मिलाकर औषधि निर्माण की प्रक्रिया का भी वर्णन है. पलनि के अरुल्मिगु दंडायुधपाणी मंदिर के गोपुरम को सोने से मढ़ा गया है. मंदिर का परिसर काफी विशाल है और यहाँ तक पहुँचने के लिए 689 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं, जबकि मंदिर के गर्भगृह तक जाने की अनुमति किसी को भी नहीं है लेकिन फिर भी यहां श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बनी रहती है.

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