ओवैसी

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के उन दावों का पर्दाफाश हो गया है, जिसमें वे मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानीयों के बारे में कई झूठे दावे करते हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार साल 2014 में केंद्र में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद मुस्लिमों में एक अजीब सी बेचैनी घर कर गई है। उन्हें अचानक से ऐसा लगने लगा है कि वो देश में सुरक्षित नहीं हैं और केंद्र सरकार लगातार इतिहास में उन मुस्लिम नायकों के नामों को मिटाने की कोशिशें कर रही है, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपनी कुर्बानी दी थी।

अब एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने इसका बीड़ा उठाया है कि वो देश को इन मुस्लिम नायकों के बारे में बताएँगें। मुस्लिमों के योगदानों को दबाए जाने का आरोप सबसे अधिक तथाकथित लिबरल और वामपंथी लगाते रहे हैं। इसी भीड़ में कूदते हुए ओवैसी ने भाजपा को फासीवादी करार दिया और कहा कि वो मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों के योगदानों को इतिहास की किताबों से मिटाने की कोशिशों में लगी हुई है।

इसके तहत ओवैसी ने हैदराबाद की मक्का मस्जिद के इमाम रहे मौलवी अलाउद्दीन, मोहम्मद मौलवी बकर, झांसी की रानी के सेनापति खुदा बख्श और उद्योगपति सबाह सादिक के नाम को आगे रखा। उन्होंने दावा किया कि मोदी सरकार इन स्वतंत्रता सेनानियों के योगदानों को इतिहास से मिटाने की साजिशें रच रही हैं। जबकि सत्य ये है कि एआईएमआईएम के नेता इसको लेकर झूठ फैला रहे हैं।

सत्य यह है कि इन चारों में से तीन मौलवी अलाउद्दीन, मोहम्मद मौलवी बकर और खुदा बख्श ये तीनों वो नाम हैं, जिन्हें पूरा देश जानता है। इन तीनों के बारे में गूगल पर ही आपको भरपूर जानकारी सहज ही मिल जाएगी, जबकि सबाह सादिक जैसे ऐसे कई गुमनाम नायक और भी हैं, जिन्हें इतिहास में जगह ही नहीं दी गई। इस देश के इस्लामिक और वामपंथी इतिहासकारों ने सबसे अधिक अन्याय अगर किसी के साथ किया है तो वो राष्ट्रवादियों के साथ किया है। राष्ट्रवादी विचारधारा के लोगों कॉन्ग्रेस ने हमेशा से दबाने की कोशिशें की। इसका परिणाम ये हुआ कि आजादी के कई महान नायकों को जो सम्मान मिलना चाहिए था वो उन्हें नहीं मिला।

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