परशुराम महादेव मंदिर

राजसमंद और पाली जिले की सीमा पर स्थित है चमत्कारिक रहस्यों से भरा परशुराम महादेव मंदिर का इतिहास सैकड़ों वर्षों नहीं अपितु कई युगों पुराना है.

भारत के राजस्थान के कुछ क्षेत्रों के इतिहास प्राचीन काल के समय से भी जुड़ा हुआ है, उनमें से एक हैं परशुराम महादेव मंदिर. इस मंदिर ने बहुत से रहस्य समाय हुए हैं. जिनमें सबसे प्रमुख है मुख्य शिवलिंग. बता दें की इसका इतिहास युगों पुराना है, बताया जाता है की इसी स्थान पर भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम ने महादेव शिव की तपस्या करी और उन्हें प्रसन्न कर उनसे दिव्य अस्त्रों का वरदान प्राप्त किया व भव्य फरसा यहीं महादेव से प्राप्त किया, जिससे वे जाने जाते हैं.

बता दें सतयुग के अंतिम क्षणों में भगवान विष्णु ने ब्राह्मण कुल में अवतार लेकर तत्कालीन असुरों और अधर्मियों का विनाश कर धर्म की स्थापना करी. जिसके बाद रामायण काल में भी भगवान परशुराम का वर्णन मिलता है और इसके अलावा महाभारत काल के समय भी पांडवों के बड़े भ्राता और दुर्योधन के परम मित्र अंग राज कर्ण ने भी भगवान परशुराम से इसी स्थान पर शिक्षा ग्रहण की थी, परन्तु कर्ण के अपना परिचय छिपाकर भगवान परशुराम को धोखे में रखकर शिक्ष्ण प्राप्त किया तो प्रभु ने उन्हें जीवन के सबसे महत्वपूर्ण युद्ध के समय सारी विद्या विस्मरण होने का श्राप दे दिया.

दैनिक जागरण की विशेष रिपोर्ट के मुताबिक अरावली पहाड़ियों के बीच स्थित इस मंदिर का निर्माण भगवान परशुराम ने ही किया था, उन्होंने महादेव शिव से वरदान स्वरूप प्राप्त फरसे से ही यहां की चट्टानों को तोड़कर उसे एक गुफा का आकर देकर मंदिर को स्थापित किया. मंदिर में स्थापित शिवलिंग को स्वयंभू माना जाता है. कहा जाता है कि पृथ्वी के 8 चिरंजीवियों में से एक परशुराम की तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव, शिवलिंग के रूप में यहां स्थापित हुए. यह शिवलिंग अत्यंत ही रहस्यमय हैं, दरअसल इस शिवलिंग में छिद्र हैं, इस कारण जब इसमें जल चढ़ाया जाता है तो यह सैकड़ों लीटर जल को अपने अंदर समाहित कर लेता है, लेकिन जब शिवलिंग को दूध अर्पित किया जाता है तो यह दूध शिवलिंग में समाता ही नहीं है. शिवलिंग से जुड़े इस रहस्य को आज तक कोई बड़ा विद्वान भी नहीं सुलझा सका.

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By Sachin

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