रंगनाथस्वामी मंदिर

अलोकिक सोंदर्य से भरा और 150 एकड़ में बना रंगनाथस्वामी मंदिर भगवान श्री हरी विष्णु को समर्पित हैं, विभीषण आज भी यहां प्रभु की पूजा करने आते हैं.

तमिलनाडू के तिरुचिरापल्ली से तकरीबन 12 किलोमीटर की दुरी पर स्थित रंगनाथस्वामी मंदिर (Ranganathaswamy Temple) दिखने में अत्यंत ही सुंदर है, इसकी वास्तुकला दुर्लभ हैं. यह भव्य मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित हैं और इसका परिसर तकरीबन 150 एकड़ तक बड़ा है. बता दें की यह मंदिर कावेरी और उसकी सहायक नदी कोल्लिदम के द्वारा बनाए गए द्वीप पर बसा है और श्रीरंगम का रंगनाथस्वामी मंदिर विश्व का सबसे विशाल संचालित मंदिर क्षेत्र है, हिंदू ग्रन्थों में यह भी माना जाता है की इस क्षेत्र का श्रृष्टि के आरम्भ से ही अस्तित्व हैं.

ऑपइंडिया की रिपोर्ट के अनुसार बहुत समय पूर्व गंगा, यमुना, कावेरी और सरस्वती में श्रेष्ठ होने की बहस छिड़ गई, जिसके बाद वे इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए श्री हरी भगवान विष्णु के पास गईं. भगवान विष्णु ने उस समय गंगा को श्रेष्ठ घोषित किया तो कावेरी ने गंगा से श्रेष्ठ बनने के लिए विष्णु भगवान की तपस्या करी, जिससे प्रसन्न होकर श्री हरी ने उन्हें वरदान देते हुए कहा की वो एक ऐसी जगह स्थापित होंगे, जहां कावेरी उनके गले के हार की तरह बहेगी.

इसके अलावा ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु के वास्तवित ‘महा विष्णु’ स्वरूप के दर्शन करने के लिए उनकी तपस्या करी. जिससे प्रसन्न होकर विष्णु भगवान ने उन्हें रंगविमान में प्रकट होकर दर्शन दिए. इस विमान को श्री हरी के वहन गरुड़ गति प्रदान कर रहे थे, शेषनाग जी ने इश्वर में छाया की हुई थी और भगवान विष्णु के साथ उनकी विश्वक सेना सहित देव ऋषि नारद उनकी स्तुति कर रहे थे. बाद में भगवान विष्णु के ही आदेश पर ब्रह्मा जी ने उनके इस रूप को विराज नदी के किनारे स्थापित कर नित्य पूजा करना आरम्भ कर दिया.

बता दें की यहां सूर्यदेव और फिर मनु और अयोध्या के राजा इक्ष्वाकु ने भगवान विष्णु के महारूप की पूजा करी. मगर इस मंदिर से एक प्रसिद्ध कथा जुड़ी है, इस कथा के मुताबिक जब भगवान राम लंका विजय के पश्चात अयोध्या आए तो उन्होंने रावण के भाई विभीषण को रंगनाथस्वामी को लंका में ले जाकर स्थापित करने की अनुमति दी. जब विभीषण उन्हें लेकर कावेरी नदी के किनारे पहुँचे तो वहाँ उनकी दैनिक पूजा के लिए नीचे रखा लेकिन पूजा के पश्चात जब वापस उठाना चाहा तो असफल रहे. इस पर विभीषण दुखी हो गए और भगवान से प्रार्थना की, तब भगवान विष्णु ने उन्हें कावेरी के वरदान की कथा बताई. इसके बाद से ही मान्यताएँ हैं कि विभीषण रोज श्रीरंगनाथस्वामी की पूजा करने आज भी आते हैं, कई मान्यताएँ है कि विभीषण प्रत्येक 12 वर्ष में श्रीरंगम आते हैं.

विक्की मीडिया की जानकारी के मुताबिक श्रीरंगम का यह मन्दिर श्री रंगनाथ स्वामी यानि की श्री विष्णु को समर्पित है, जहां सव्यंम् श्री विष्णु (भगवान् श्री हरि विष्णु शेषनाग शैय्या पर विराजे हुए) हैं. यह द्रविण शैली में निर्मित है. श्रीरंगम अपने श्री रंगनाथस्वामी मंदिर के लिए प्रसिद्ध है, जो हिन्दुओं ओर विशेष रूप से वैष्णवों का एक प्रमुख तीर्थयात्रा गंतव्य और भारत के सबसे बड़े मंदिर परिसरों में से एक है.

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