ऋग्वेद

प्रथम वेद कह जाने वाला ऋग्वेद सनातन धर्म का सबसे आरम्भिक स्रोत है, एक मनुष्य में संस्कार और यज्ञ आदि शुभकार्यों के लिए मंत्र इसी की देन हैं.

सनातन धर्म में ग्रन्थों की बहुत मान्यता होती है, इसमें अनेक ग्रन्थ है. इन ग्रन्थों में से सबसे प्रथम वेदों को माना जाता है, ईश्वरीय वाणीऋग्वेद या वेद चार होता है. जिनके नाम ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्वेद और सामवेद हैं. इनमें से भी सबसे पहला ऋग्वेद है, इसी आधार पर ऋग्वेद को सनातन धर्म का सबसे आरम्भिक स्रोत कहा गया है. यह वेद मानवता को संस्कार और ईश्वर की आराधना के लिए किए जाने यज्ञ में उच्चारित होने वाले मन्त्रों का ज्ञान देता है.

विक्की पीडिया की विशेष जानकारियों के मुताबिक ऋग्वेद में 10 मण्डल, 1017 सूक्त और वर्तमान में 10,600 मन्त्र हैं. ऋक् संहिता में 10 मण्डल, बालखिल्य सहित 1028 सूक्त हैं. वेद मन्त्रों के समूह को सूक्त कहा जाता है, जिसमें एकदैवत्व तथा एकार्थ का ही प्रतिपादन रहता है. ऋग्वेद में ही मृत्युनिवारक ‘त्र्यम्बक-मंत्र’ या ‘मृत्युंजय मन्त्र’ (7/59/12) वर्णित है, ऋग्विधान के अनुसार इस मन्त्र के जप के साथ विधिवत व्रत तथा हवन करने से दीर्घ आयु प्राप्त होती है तथा मृत्यु दूर हो कर सब प्रकार का सुख प्राप्त होता है. विश्व-विख्यात गायत्री मन्त्र (ऋ० 3/62/10) भी इसी में वर्णित है. इस में अनेक प्रकार के लोकोपयोगी-सूक्त, तत्त्वज्ञान-सूक्त, संस्कार-सुक्त उदाहरणतः रोग निवारक-सूक्त (ऋ॰ 10/137/1-7), श्री सूक्त या लक्ष्मी सूक्त (ऋग्वेद के परिशिष्ट सूक्त के खिलसूक्त में), तत्त्वज्ञान के नासदीय-सूक्त (ऋ॰ 10/129/1-7) तथा हिरण्यगर्भ सूक्त (ऋ॰ 1/121/1-10) और विवाह आदि के सूक्त (ऋ॰ 10/85/1-47) वर्णित हैं, जिनमें ज्ञान विज्ञान का चरमोत्कर्ष दिखलाई देता है.

बता दें की ऋग्वेद को ही संसार का सबसे पहला ग्रन्थ भी माना जाता है. इस वेद में वैदिक काल के देवी-देवताओं की स्तुति करने वाले मन्त्रों का वर्णन है. इसी वेद में देवताओं के राजा इंद्र को सर्वशक्तिमान देव बताया गया है. गौरतलब है की ऋग्वेद के एक मण्डल में केवल एक ही देवता की स्तुति में श्लोक हैं, वह सोम देवता है.

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