सिंहाचलम मंदिर

भगवान विष्णु के परम भक्त प्रहलाद ने वर्तमान विशाखापट्टनम की एक पहाड़ी पर युगों पहले स्थापित करवाया भगवान भगवान नरसिंह का सिंहाचलम मंदिर.

सनातन धर्म को प्रमाणित करने वाले भारत में अनेकों मंदिर हैं उनमें से एक हैं सिंहाचलम मंदिर. सिंहाचलम मंदिर भगवान नरसिंह को समर्पित हैं और वर्तमान विशाखापट्टनम की सिंहाचल पहाड़ी पर इस मंदिर का निर्माण युगों पहले विष्णु भक्त व तत्कालीन असुरराज हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रहलाद ने करवाया था. बता दें की भगवान नरसिंह भगवान विष्णु के चौथे अवतार थे और उन्होंने ही राक्षस हिरण्यकश्यप का वध कर इस धरती को पापा मुक्त किया था, वे श्री हरी के अनेकों अवतारों में सबसे उग्र माने जाते हैं.

ऑपइंडिया की विशेष रिपोर्ट् के मुताबिक युगों पूर्व जब प्रह्लाद की नारायण भक्ति से महाशक्तिशाली राक्षस उसके पिता हिरण्यकश्यप के अहंकार को ठेस पहुंची तो उसने अपने ही बेटे को बहुत कष्ट दिए और उसे मारने के लिए कई उपाय किए, लेकिन प्रभु की कृपया से प्रह्लाद पूरी तरह से सुरक्षित रह गया. अंततः जब हिरण्यकश्यप का अत्याचार हद से अधिक बढ़ गया तो भगवान विष्णु ने उसका संहार करने के लिए नरसिंह अवतार लिया. भगवान नरसिंह ने हिरण्यकश्यप का वध किया और अपने अनन्य भक्त प्रह्लाद की रक्षा करी.

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इस घटना के बाद ही प्रहलाद द्वारा सिंहाचलम मंदिर का निर्माण करवाया गया, सिंह का अर्थ होता है शेर और इसका सम्पूर्ण अर्थ होता है शेर का पर्वत. बता दें की मानवीय लापरवाहियों के कारण यह मंदिर अपनी स्थापना के सदियों बाद धरती में समा गया था, इस मंदिर के दोबारा अस्तित्व में आने की घटना का वर्णन स्थल पुराण में है. एक बार लुनार वंश के राजा पुरुरवा अपनी पत्नी उर्वशी के साथ अपने विमान में बैठकर कहीं जा रहे थे, लेकिन किसी अदृश्य शक्ति के प्रभाव में आकर उनका विमान सिंहाचल पर्वत पर पहुँच गया और देववाणी से प्रेरित होकर उन्होंने धरती के अंदर से भगवान नरसिंह की यह प्रतिमा बाहर निकाली और देववाणी के आदेशानुसार उस प्रतिमा को चंदन के लेप से ढंक कर पुन: स्थापित कराया.

विक्की पीडिया की जानकारियों के अनुसार सिंहाचलम मंदिर को श्री वाराह लक्ष्मी नरसिंह मन्दिर भी कहा जाता है. बता दें की यह भगवान विष्णु के वाराह नरसिंह रूप का मन्दिर है. केवल अक्षय तृतीय को छोड़कर बाकी दिन यह मूर्ति चन्दन से ढकी रहती है जिससे यह मूर्ति ‘शिवलैंग’ जैसा प्रतीत होती है. अक्षय तृतीया के पवित्र दिन (वैशाख मास) सिंहाचल पर्वत की छटा ही निराली होती है. इस पवित्र दिन यहाँ विराजमान श्री लक्ष्मीनृसिंह भगवान का चन्दन से श्रृंगार किया जाता है. माना जाता है कि भगवान की प्रतिमा का वास्तविक स्वरूप केवल इसी दिन देखा जा सकता है, सिंहाचल क्षेत्र ग्यारहवीं शताब्दी में बने विश्व के गिने-चुने प्राचीन मंदिरों में से एक माना जाता है.

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By Sachin

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