हिंदू राजा

हमें अक्सर पढ़ाया जाता है की मुगल महान और पराक्रमी थे, जिनके आगे तत्कालीन हिंदू राजा भी नतमस्तक होते थे। लेकिन आज हम आपको उस इतिहास से रूबरू करवाएंगे जिसे आधुनिक इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास से लुप्त कर दिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार विष्णु शर्मा (Vishnu Sharma) की किताब ‘इतिहास के 50 वायरल सच’ में इतिहास के एक ऐसे सच को बताया गया है जो आज तक हम सबसे छुपाया गया, जी हाँ! इसमें वर्तमान भरतपुर जिले में स्थित प्राचीन रियासत सिनसिनी और उसके राजा राजाराम जाट की वीरता और एक अनोखे बदले का भी वर्णन किया गया है। ये बात है आज से करीब साढ़े तीन सौ साल पहले की जब मुगल शासक औरंगजेब अपनी कुरुरता को कायम रखने के लिए किसी भी हद तक जा सकता था।

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औरंगजेब ने वर्ष 1670 में 1 जनवरी को आगरा कोतवाली में राजा गोकुल जाट और उदय सिंह को फांसी पर लटका कर एक दर्दनाक मौत दी थी, तत्कालीन जाट उनकी इस मृत्यु के गुंठ को तब तो सह गए। लेकिन उसे कभी भूले भी नहीं, उनके अंदर बदले की एक भयानक भावना भी पल रही थी। इसी के चलते घटना के 15 सालों के बाद जाटों को एक हिम्मतवाला राजा मिला ओर इस राजा का नाम ‘राजाराम जाट’ था, जो मुगलों भिड़ने और उनका खात्मा करने की भी मंशा रखते थे।

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कहा जाता है की मुगलों के खिलाफ लड़ाई में राजाराम जाट का साथ जाट नेता रामकी चाहर ने भी दिया, उन्होंने बंदूकें इकट्ठी करनी शुरू की, कई छावनियां जंगलों में बनाईं, शिवाजी की तरह उन्होंने मुगलों को परेशान करना शुरू कर दिया। मुगलों की छोटी टुकड़ियों पर आक्रमण करने लगे, गौरिल्ला पद्धति से अटैक करके जंगल में गायब हो जाते थे।

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आपको बताते चलें की उन्होंने मुगलों का कई बार खजाना लूट लिया और उससे अपनी फौज खड़ा करने में मदद मिली। इतना ही नहीं उन्होंने पूरे आगरा, मथुरा और भरतपुर इलाके में बीच बीच में अपनी पोस्ट्स इस तरह से बनाईं कि कोई भी मुगल कारवां सुरक्षित न निकल सके, जो भी उधर आए। एक बार तो वो धौलपुर के पास तक मुगल फौजदार खान बहादुर पर चढ़ बेटे, उसके दामाद समेत 80 सैनिकों को मारा और सैकड़ों घोड़ों को छुड़ा लाए।

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वहीं दक्षिण में फंसे औरंगजेब ने 1686 में जफर जंग कोकलताश की अगुवाई में मुगल फौज, जाटों को कुचलने के लिए भेजी, लेकिन जाटों ने उन्हें जबरदस्त शिकस्त दी। 1987 में औरंगजेब ने फिर अपने शहजादे आजम के बेटे बीदर बख्त की अगुवाई में एक और फौज भेजी, साथ में खान जहां को भी भेजा, लेकिन जाटों का वो भी कुछ नहीं बिगाड़ पाई। उससे पहले उसने आजम को ही भेजा था, लेकिन गोलकुंडा में जरूरत के चलते उसे बुरहानपुर से ही वापस बुला लिया था।

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गौरतलब है की राजाराम ने उलटे मीर इब्राहिम यानी महावत खान के कैम्प पर हमला बोलकर करीब 200 मुगल सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। आगरा के फौजदार शाइस्ता खान को हराकर आगरा पर एक तरह से कब्जा कर लिया। लेकिन राजा राम टिकने वाले नहीं थे, वो ये संदेश देना चाहते थे कि उन्होंने गोकुल जाट की मौत का बदला ले लिया है। इसके लिए उन्हें मुगल खानदान से ही कोई चाहिए था, जिसका वो अपमान कर पाते।

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वहीं आपको बताते चलें की वो पहले शहजादे बीदर बख्त की सेना को मात दे चुके थे। फिर भी गुस्से में राजा राम ने अकबर के मकबरे पर ही हमला बोल दिया। ये मकबरा सिकंदरा नाम से, आगरा-दिल्ली हाईवे पर शहर के बाहरी इलाके में मौजूद है। अलग-अलग इतिहासकार इस घटना के बारे में लिखते हैं, किसी ने लिखा है कि राजाराम ने वहां लगे हीरे जवाहरात भी लूट लिए, तोड़फोड़ भी की, किसी ने लिखा है कि राजाराम जाट ने उन्हें हाथ तक नहीं लगाया। लेकिन सब एक बात पर सहमत हैं कि उन्होंने अकबर की कब्र खोदकर उसकी हड्डियां निकालीं और उनमें आग लगा दीं। शायद हिंदुओं की तरह अंतिम संस्कार करके गुस्सा दिखाने का भाव रहा होगा।

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