वेदगिरीश्वर मंदिर

तिरुकलुकुन्द्रम में स्थित वेदगिरीश्वर मंदिर भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित हैं, इस शिवालय में सदियों से 2 शाकाहारी गिद्ध प्रसाद लेने आया करते थे.

दक्षिण भारत के तमिलनाडू में प्राचीन मंदिरों का मानों कोई संग्रहालय है, इन मंदिरों का इतिहास आदि काल के समय का है. यहां के कई देव धामों का वर्णन रामायण, महाभारत और शिव पुराण जैसे महा ग्रन्थों में भी मिलता है. इसी श्रेणी में शामिल है चेंगलपट्टू जिले के तिरुकलुकुन्द्रम में स्थित वेदगिरीश्वर मंदिर, भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित इस मंदिर का इतिहास आदि काल से जुड़ा हुआ है. यहां सदियों से 2 शाकाहारी गिद्ध प्रसाद खाने के लिए आते थे, आखरी बार वे सं 1998 में आए थे.

ऑपइंडिया की विशेष रिपोर्ट के मुताबिक प्राचीन काल में भारद्वाज ऋषि ने भगवान शिव से लंबी आयु के लिए प्रार्थना की ताकि वो सभी वेदों को सीख सकें. इस पर भगवान शिव ने उनकी इच्छा पूर्ति की लेकिन उन्होंने चार वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद) को प्रदर्शित करते हुए चार पर्वत बनाए और एक मुट्ठी मिट्टी लेते हुए भारद्वाज ऋषि से कहा कि इन चार पर्वतों के आगे जितनी एक मुट्ठी मिट्टी है, वो (भारद्वाज ऋषि) उतना ही सीख पाएँगे. यही वेद रूपी चार पर्वत जहाँ स्थित हैं, वहाँ भगवान शिव को समर्पित एक मंदिर का निर्माण किया गया, जिन्हें वेदगिरीश्वर कहा गया.

वेदों के वर्णन के अलावा यह मंदिर एक ओर कहानी को लेकर प्रसिद्ध है, दरअसल भगवान शिव ने एक बार 8 ऋषियों को एक साथ गिद्ध बन जाने का श्राप दे दिया था. श्राप के सबसे महादेव से क्षमा मांगकर इस श्राप से मुक्ति का मार्ग पूछा तो दया के सागर महादेव ने उन्हें कहा की आप सभी 2 – 2 करके चारों युगों में प्रतिदिन बनारस में स्नान करके वेदगिरीश्वर मंदिर आकर पुजारी के हाथों से प्रसाद खाकर रामेश्वरम जाना और फिर रात्रि को चिदंबरम मंदिर में विश्राम करना. 6 ऋषियों को तो सतयुग, त्रेतायुग और द्वापर में मुक्ति मिल गई. बचे हुए 2 ऋषि इस कलयुग में महादेव के बताए उसी प्राश्चित मार्ग पर चल रहे थे, परंतु अंतिम बार उन्हें 1998 में देखा गया था. बताया जाता है की यदि कोई पापी उन्हें देखने के लिए मंदिर में हो तो वे नहीं आते, इसलिए प्रतीत होता है की अब इस संसार में सभी पापी हैं अथवा उन्हें मुक्ति मिल चुकी है.

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