विभीषण

लंकेश रावण के छोटे भाई और परम राम भक्त विभीषण आज भी सशरीर जीवित हैं, उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए स्वयं पर कुलनाशक का लांछन भी स्वीकार किया.

रामायण के प्रमुख पात्रों में से एक और रावण के सबसे छोटे भाई विभीषण की कथा उतनी ही रहस्यमय है, जितना उनका असुर होकर भी धर्म के पथ पर चलना. विभीषण ऋषि पुलस्त्य के पुत्र ऋषि विश्रवा और कैकसी के सबसे छोटे पुत्र थे, रावण और कुंभकर्ण इनके ही बड़े भाई थे और शूर्पणखा इनकी बेहन थी. इन्होंने अपने जीवन में सदा ही धर्म के पथ पर चले, रावण की मृत्यु का राज भगवान श्री राम को विभीषण ने ही बताया था. बता दें की भगवान राम ने मनुष्य शरीर के त्याग के समय हनुमान जी के साथ – साथ विभीषण को भी धर्म की रक्षा के लिए सदा ही जीवित रहने का वरदान दिया था.

हिंदुओं के पौरोणिक ग्रन्थों के मुताबिक रावण, कुंभकर्ण और विभीषण तीनों ही बाल्यकाल से ही साथ रहे और तीनों ने तपस्या भी एक साथ ही पूर्ण करी, जिसके बाद रावण ने अजय शक्तियों और कभी पराजित न होने वाला वरदान मांगा, देवताओं के छल के कारण कुंभकर्ण ने जीवन भर सोने का वर मांगा और विभीषण ने सदा ही धर्म के पथ पर चलने का वरदान ब्रह्मा जी से मांगा. जब हनुमान जी माता सीता की खोज में लंका आए थे तब उन्हें इन्होंने ने ही अशोक वाटिका का पता बताया था.

भगवान राम के लंका के समीप आने पर इन्होंने अपने भाई रावण को बहुत समझाया की माता सीता को पुन: प्रभु राम को सौंप दो, परन्तु अहंकारी रावण ने अपने ही छोटे भाई को क्रोध में आकर लंका से निष्काषित कर दिया. जिसके बाद वे श्री राम की शरण में चले गए, युद्ध में भी उन्होंने वानर सेना की बहुत सहायता करी थी और रावण के अंत का कारण भी बने. बाद में भगवान राम लंका इनको सोंप दी और राज्याभिषेक किया. बता दें की रावण के अपनी मृत्यु के समय प्रिय पत्नी मंदोदरी की सुरक्षा के लिए उसे विभीषण से विवाह करने को कहा और पति व्रता नारी होने के कारण अपने पति आज्ञा का पालन करते हुए उन्होंने अपने देवर से विवाह किया.

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