विदुर

महात्मा विदुर समस्त वेदों और धर्म के ज्ञाता थे, उन्होंने आजीवन धर्म का पालन किया और महाभारत युद्ध के समय भी वे शांति और न्याय के पक्ष में थे.

महाभारत काल में बहुत से विद्वान हुए थे, जिनमें से एक नाम महात्मा विदुर का भी सम्मलित हैं. विदुर का जन्म भी भाग्यवश हुआ था, क्योंकि महाराज शांतनु की मृत्यु के बाद उनके पुत्र विचित्रवीर्य को हस्तिनापुर का राज मिला. किन्तु उनकी निसंतान ही मृत्यु हो गई और पीछे रह गई उनकी दोनों पत्नियाँ अम्बिका और अम्बालिका. कुरुवंश को आगे बढ़ाने के लिए सत्यवती ने अपने पुत्र भगवान वेद्वयास को बुलाया और उन्हें अपने भाइयों के वंश को बचाने के लिए नियोग खातिर मना लिया.

नियोग के दौरान अम्बिका ने वेदव्यासजी के तेज को न देख सकीं और अपने नेत्र बंद कर लिए और इसी कारण उनके पुत्र धृतराष्ट्र जन्म से ही नेत्रहीन थे. इसके बाद अम्बालिका नियोग के समय घबराहट के मारे पिली पड़ गई और इस कारण उनके पुत्र पांडू जन्म से ही पांडू रोग से ग्रस्त थे. ये देख सत्यवती ने वेदव्यासजी को फिर से अम्बिका के पास जाने का आदेश दिया, लेकिन इस बार अम्बिका ने खुद न जाकर एक दासी को संभोग के लिए भेज दिया और उसी दासी से जन्में धर्म और वेदों के ज्ञाता विदुर.

महात्मा विदुर ने जीवन भर धर्म का पालन किया. आज के युग में जिस विदुर-नीति की चर्चा अक्सर होती रहती हैं वह इन्हीं के नाम और सोच पर आधारित हैं. उनकी विदुर-नीति वास्तव में महाभारत युद्ध से पूर्व युद्ध के परिणाम के प्रति शंकित हस्तिनापुर के महाराज धृतराष्ट्र के साथ उनका संवाद है. बता दें की विदुर वर्तमान की परिस्थितियों को देखकर भविष्य को भी भांप लेते थे. उन्होंने महाराज धृतराष्ट्र को बहुत बार समझाया की पुत्र मोह में इतने भी अंधे ना होवें की प्रजा का सुख और दुःख भी भूल जाए. लेकिन उनकी किसी ने न सुनी और अंत में महाभारत युद्ध हुआ और शस्त्रों सेनिकों व योद्धाओं को कुरुक्षेत्र की उस रणभूमि ने निगल लिया. लेकिन आज भी विदुर को महात्मा ही माना जाता है और उनकी नीतियों को भी अपनाया जा रहा है.

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