वीरभद्र

शिव पुराण में वर्णित है की देवों के देव महादेव शिव के अवतार वीरभद्र ने उनके ही ससुर प्रजापति दक्ष का सर काटकर उसी के यज्ञ में होम दिया था.

हिंदुओं के कई प्राचीन ग्रन्थों और शिव पुराण में भी वर्णित है की महादेव के बार – बार अपमान होता देख उनकी पत्नी सती यह सहन न कर सकी और उन्होंने अपने शरीर को अग्नि कुंड में झोंक दिया. जिसके बाद महादेव शिव अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने तांडव करते हुए अपनी जटा से अपने ही अंश वीरभद्र को उत्पन्न किया. वीरभद्रजी ने शिव जी के आदेशानुसार प्रजापति दक्ष को दंडित करने के लिए चले गए और उनके ही यज्ञ में पहुंचकर दक्ष का सर उनकी धड़ से अलग कर उसे यज्ञ में झोंक दिया.

दरअसल प्रजापति दक्ष ब्रह्माजी के ही मानस पुत्र थे, ब्रह्मा जी का पांचवां सर भगवान शिव ने काटा था इस कारण वे शिव से घृणा करते थे और उन्हें अपमानित करने का कोई अवसर भी नहीं छोड़ते थे. इन सबके बावजूद भी दक्ष की एक पुत्री और महाशक्ति का रूप माने जाने वाली देवी सती महादेव उनता ही अधिक प्रेम करती थी जितना उनके पिता शिव जी से घृणा करते थे. महादेव को भी माता सती से प्रेम होने के बाद दोनों का विवाह भी सम्पन्न हो गया. महादेव को जमाता के रूप में पा कर भी दक्ष की घृणा समाप्त नहीं हुई.

उसने एक महा यज्ञ का आयोजन कर समस्त देवी-देवताओं को निमंत्रित किया, लेकिन उन्होंने महादेव शिव और माता सती को नहीं बुलाया, फिर भी माता सती वहां बिन बुलाए पहुंच गई. मगर जब पुन: दक्ष ने महादेव को अपमानित किया तो उन्होंने क्रोधवश खुद को अग्नि में मग्न कर महाशक्ति ने अपने मानव शरीर का त्याग कर दिया. इसी कारण महादेव ने क्रोध में आकर दक्ष का वध करने के लिए वीरभद्र को उत्पन्न किया था. कुछ कथाओं में तो वीरभद्र के पुत्रों के बारे में कथाएँ प्रचलित है की उनके पोनभद्र, पूनिया, क्ल्हनभद्र, कल्हण, अतिसुरभद्र, आंजना, जखभद्र, जाखड, ब्रह्मभद्र, भीमरौलिया, दहीभद्र और दहिया नामक छ: पुत्र भी थे.

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