युधिष्ठिर

महाभारत के वह नायक जिन्होंने अपनी पत्नी को जुवे में हारने का कलंक माथे पर लगाया मगर कभी धर्म का पक्ष नहीं छोड़ा, स्वर्ग में जीवित पहुंचे थे युधिष्ठिर.

महाभारत काल में एकमात्र ऐसा योद्धा जिसने कभी धर्म का त्याग नहीं किया और ना ही कभी असत्य कहा, पांडू पुत्र और कोंतेई युधिष्ठिर. युधिष्ठिर पांडू और कुंती के पुत्र तो थे ही, परन्तु वे धर्मराज यम के मंत्र प्रसाद पुत्र के रूप में जन्में थे इसलिए उन्हें यम को भी उनका पिता माना जाता था. उन्होंने अपने जीवन काल में कभी धर्म का पथ नहीं और सदा ही न्याय, शांति और प्रजा के हित में ही निर्णय लिए, इसके अलावा वे एक योद्धा भी थे और भाला चलाने में निपुण थे.

बाल्यकाल में ही पिता पांडू की मृत्यु के पश्च्यात युधिष्ठिर ही अपने चारों अनुज भाइयों का धर्य और साहस बने, वे हमेशा ही दुर्योधन के सभी अपराधों को क्षमा करते रहे. उनके गुरु भगवान परशुराम जी के शिष्य और महर्षि भारद्वाज के पुत्र महा गुरु द्रोणाचार्य ही थे. दुर्योधन के वार्नावार्त के षड्यंत्र के बाद युधिष्ठिर ने पुन: हस्तिनापुर नहीं जाने का निर्णय किया, उन्होंने यह पारिवारिक शांति के लिए किया जिससे एक भाई को दुसरे भाई की हत्या ना करनी पड़े. परन्तु नियति को कुछ ओर ही स्वीकार था.

भगवान वेद्वयास जी समझाने के बाद वे अपने भाइयों और पत्नी द्रोपदी सहित हस्तिनापुर गए और अपने युवराज होने का दावा किया, जिसे सभी को स्वीकार करना पड़ा. परन्तु दुर्योधन की हट के कारण हस्तिनापुर का विभाजन करना पड़ा और पाँचों पांडवों को खांडवपरस्त सौंपा गया, जिसे उन्होंने अपनी मेहनत और तपस्या से इन्द्रप्रस्थ बनाया और एक धर्म नगरी बसाई. उन्होंने अपने राज्य में राजसूय यज्ञ का आवाहन किया और वे चक्रवर्ती सम्राट भी घोषित हुए. बता दें की द्रोपदी के अलावा उन्होंने देविका से विवाह किया था और उनके और द्रोपदी का पुत्र और प्रतिविंध्य व उनके और देवकी का पुत्र धोधेय था, परन्तु ये दोनों ही युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए.

बाद में शकुनी के कपट और छल के कारण उन्हें अपने भाइयों सहित पत्नी को द्युत सभा में दाव पर लगाना पड़ा, लेकिन जुवे में इनता कुछ होने के बावजूद भी उन्होंने कभी धर्म के पथ का त्याग नहीं किया. अपने तातश्री धृतराष्ट्र के द्वारा दिए गए 12 वर्ष के वनवास और 1 वर्ष के अग्यात्वास को उन्होंने सहज ही स्वीकार किया. महाभारत के महायुद्ध से पूर्व भी उन्होंने संधि और शांति की कई बार पहल करी लेकिन दुर्योधन नहीं माना तो मजबूरन युद्ध करना पड़ा.

उन्होंने जीवन में कभी सत्य नहीं बोला, इसलिए द्रोणाचार्य के हाथों से युद्ध में शस्त्रों का त्याग करवाने के लिए श्री कृष्ण की योजना अनुसार भीम ने अश्व्थामा हाथी का वध किया और युधिष्ठिर ने गुरु द्रोणाचार्य से कहा की अश्व्थामा मारा गया, गुरु द्रोण ने यह मान लिया उनका पुत्र मारा गया है इसलिए उन्होंने ने भी अपने शस्त्रों का त्याग कर दिया और दृष्दुमं ने उनका वध कर दिया. युद्ध में उन्होंने मामा शल्य का संहार किया था चूंकि वे कोरवों के पक्ष से रणभूमि में उतरे थे. युद्ध के बाद उन्होंने हस्तिनापुर सहित सम्पूर्ण भारत के राजा बने क्योंकि युद्ध में भारत के सभी राजाओं को अंत हो गया था. इनके बाद समग्र राज्य का राजभार अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित ने संभाला था. अपने धर्म को कभी नहीं छोड़ने के कारण वे अकेले ऐसे मनुष्य बने जो जीवित स्वर्ग में पहुंचे.

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